श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.58

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

हिरण्यकशिपुरुवाच

बा१ल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः।

ज्ञातयो मेनिरे सर्वमनित्यमयथोत्थितम्॥ ५८

bāla evaṃ pravadati sarve vismitacetasaḥ|

jñātayo menire sarvamanityamayathotthitam|| 58

अर्थ

हिरण्यकशिपुने कहा—उस छोटेसे बालककी ऐसी ज्ञानपूर्ण बातें सुनकर सब-के-सब दंग रह गये। उशीनर-नरेशके भाई-बन्धु और स्त्रियोंने यह बात समझ ली कि समस्त संसार और इसके सुख-दुःख अनित्य एवं मिथ्या हैं॥ ५८॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—काल।

    (मुद्रित पृष्ठ 818)

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