श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.57

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

एवं यूयमपश्यन्त्य आत्मापायमबुद्धयः।

नैनं प्राप्स्यथ शोचन्त्यः पतिं वर्षशतैरपि॥ ५७

evaṃ yūyamapaśyantya ātmāpāyamabuddhayaḥ|

nainaṃ prāpsyatha śocantyaḥ patiṃ varṣaśatairapi|| 57

अर्थ

मूर्ख रानियो! तुम्हारी भी यही दशा होनेवाली है। तुम्हें अपनी मृत्यु तो दीखती नहीं और इसके लिये रो-पीट रही हो! यदि तुमलोग सौ बरसतक इसी तरह शोकवश छाती पीटती रहो, तो भी अब तुम इसे नहीं पा सकोगी॥ ५७॥✎ 2020

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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