श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.56

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

एवं कुलिङ्गं विलपन्तमारात्

प्रियावियोगातुरमश्रुकण्ठम् ।

स एव तं शाकुनिकः शरेण

विव्याध कालप्रहितो विलीनः॥ ५६

evaṃ kuliṅgaṃ vilapantamārāt

priyāviyogāturamaśrukaṇṭham |

sa eva taṃ śākunikaḥ śareṇa

vivyādha kālaprahito vilīnaḥ|| 56

अर्थ

इस तरह वह पक्षी बहुत-सा विलाप करने लगा। अपनी सहचरीके वियोगसे वह आतुर हो रहा था। आँसुओंके मारे उसका गला रुँध गया था। तबतक कालकी प्रेरणासे पास ही छिपे हुए उसी बहेलियेने ऐसा बाण मारा कि वह भी वहींपर लोट गया ॥ ५६॥✎ 2020

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2020 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें