श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.55

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

कथं त्वजातपक्षांस्तान् मातृहीनान् बिभर्म्यहम्।

मन्दभाग्याः प्रतीक्षन्ते नीडे मे मातरं प्रजाः॥ ५५

kathaṃ tvajātapakṣāṃstān mātṛhīnān bibharmyaham|

mandabhāgyāḥ pratīkṣante nīḍe me mātaraṃ prajāḥ|| 55

अर्थ

अभी मेरे अभागे बच्चोंके पर भी नहीं जमे हैं। स्त्रीके मर जानेपर उन मातृहीन बच्चोंको मैं कैसे पालूँगा? ओह! घोंसलेमें वे अपनी माँकी बाट देख रहे होंगे’॥ ५५॥✎ 2020

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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