श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.17

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

ब्रह्मोवाच

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तपःसिद्धोऽसि काश्यप।

वरदोऽहमनुप्राप्तो व्रियतामीप्सितो वरः॥ १७

uttiṣṭhottiṣṭha bhadraṃ te tapaḥsiddho'si kāśyapa|

varado'hamanuprāpto vriyatāmīpsito varaḥ|| 17

अर्थ

ब्रह्माजीने कहा—बेटा हिरण्यकशिपु! उठो, उठो। तुम्हारा कल्याण हो। कश्यपनन्दन! अब तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गयी। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, बेखटके माँग लो॥ १७॥

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