आप ही अपने त्रिगुणमय रूपसे इसकी रचना, रक्षा और संहार करते हैं। आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रय हैं। आप ही सबसे परे और महान् हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २७॥
आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति।
रजः सत्त्वतमोधाम्ने पराय महते नमः॥ २७
आप ही अपने त्रिगुणमय रूपसे इसकी रचना, रक्षा और संहार करते हैं। आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रय हैं। आप ही सबसे परे और महान् हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.3.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 821) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/3/27/