श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.30

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा

त्रय्या चातुर्होत्रकविद्यया च।

त्वमेक आत्माऽऽत्मवतामनादि-

रनन्तपारः कविरन्तरात्मा॥ ३०

tvaṃ saptatantūn vitanoṣi tanvā

trayyā cāturhotrakavidyayā ca|

tvameka ātmā''tmavatāmanādi-

ranantapāraḥ kavirantarātmā|| 30

अर्थ

जो वेद होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—इन ऋत्विजोंसे होनेवाले यज्ञका प्रतिपादन करते हैं, वे आपके ही शरीर हैं। उन्हींके द्वारा अग्‍निष्टोम आदि सात यज्ञोंका आप विस्तार करते हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा हैं। क्योंकि आप अनादि, अनन्त, अपार, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं॥ ३०॥

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