श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.31

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-

मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि।

कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महां-

स्त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा॥ ३१

tvameva kālo'nimiṣo janānā-

māyurlavādyāvayavaiḥ kṣiṇoṣi|

kūṭastha ātmā parameṣṭhyajo mahāṃ-

stvaṃ jīvalokasya ca jīva ātmā|| 31

अर्थ

आप ही काल हैं। आप प्रतिक्षण सावधान रहकर अपने क्षण, लव आदि विभागोंके द्वारा लोगोंकी आयु क्षीण करते रहते हैं। फिर भी आप निर्विकार हैं। क्योंकि आप ज्ञानस्वरूप, परमेश्‍वर, अजन्मा, महान् और सम्पूर्ण जीवोंके जीवनदाता अन्तरात्मा हैं॥ ३१॥

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