सर्वांगसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरोंसे रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमिपर इधर-उधर टहला करती थीं और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं॥ ११॥
कूजद्भिर्नूपुरैर्देव्यः शब्दयन्त्य इतस्ततः।
रत्नस्थलीषु पश्यन्ति सुदतीः सुन्दरं मुखम्॥ ११
सर्वांगसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरोंसे रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमिपर इधर-उधर टहला करती थीं और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 824) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/4/11/