श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.12

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तस्मिन्महेन्द्रभवने महाबलो१

महामना निर्जितलोक एकराट्।

रेमेऽभिवन्द्याङ्‌घ्रियुगः सुरादिभिः

प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥ १२

tasminmahendrabhavane mahābalo

mahāmanā nirjitaloka ekarāṭ|

reme'bhivandyāṅghriyugaḥ surādibhiḥ

pratāpitairūrjitacaṇḍaśāsanaḥ || 12

अर्थ

उस महेन्द्रके महलमें महाबली और महामनस्वी हिरण्यकशिपु सब लोकोंको जीतकर, सबका एकच्छत्र सम्राट् बनकर बड़ी स्वतन्त्रतासे विहार करने लगा। उसका शासन इतना कठोर था कि उससे भयभीत होकर देव-दानव उसके चरणोंकी वन्दना करते रहते थे॥ १२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—महासुरो महाबलो नि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 824)

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