॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.4.17
रत्नाकराश्च रत्नौघांस्तत्पत्न्यश्चोहुरूर्मिभिः।
क्षारसीधुघृतक्षौद्रदधिक्षीरामृतोदकाः ॥ १७
ratnākarāśca ratnaughāṃstatpatnyaścohurūrmibhiḥ|
kṣārasīdhughṛtakṣaudradadhikṣīrāmṛtodakāḥ || 17
अर्थ
इसी प्रकार खारे पानी, सुरा, घृत, इक्षुरस, दधि, दुग्ध और मीठे पानीके समुद्र भी अपनी पत्नी नदियोंके साथ तरंगोंके द्वारा उसके पास रत्नराशि पहुँचाया करते थे॥ १७॥