पर्वत अपनी घाटियोंके रूपमें उसके लिये खेलनेका स्थान जुटाते और वृक्ष सब ऋतुओंमें फूलते-फलते। वह अकेला ही सब लोकपालोंके विभिन्न गुणोंको धारण करता॥ १८॥
शैला द्रोणीभिराक्रीडं सर्वर्तुषु गुणान् द्रुमाः।
दधार लोकपालानामेक एव पृथग्गुणान्॥ १८
पर्वत अपनी घाटियोंके रूपमें उसके लिये खेलनेका स्थान जुटाते और वृक्ष सब ऋतुओंमें फूलते-फलते। वह अकेला ही सब लोकपालोंके विभिन्न गुणोंको धारण करता॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 824) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/4/18/