श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.28

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने।

प्रह्रादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम्॥ २८

nirvairāya praśāntāya svasutāya mahātmane|

prahrādāya yadā druhyeddhaniṣye'pi varorjitam|| 28

अर्थ

जब यह अपने वैरहीन, शान्त और महात्मा पुत्र प्रह्लादसे द्रोह करेगा—उसका अनिष्ट करना चाहेगा, तब वरके कारण शक्तिसम्पन्‍न होनेपर भी इसे मैं अवश्य मार डालूँगा।’॥ २८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें