श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.29

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

नारद उवाच

इत्युक्ता लोकगुरुणा तं प्रणम्य दिवौकसः।

न्यवर्तन्त गतोद्वेगा मेनिरे चासुरं हतम्॥ २९

ityuktā lokaguruṇā taṃ praṇamya divaukasaḥ|

nyavartanta gatodvegā menire cāsuraṃ hatam|| 29

अर्थ

नारदजी कहते हैं—सबके हृदयमें ज्ञानका संचार करनेवाले भगवान्‌ने जब देवताओंको यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आये। उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि हिरण्यकशिपु मर गया॥ २९॥✎ 584

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #584 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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