नारदजी कहते हैं—सबके हृदयमें ज्ञानका संचार करनेवाले भगवान्ने जब देवताओंको यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आये। उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि हिरण्यकशिपु मर गया॥ २९॥✎ 584
इत्युक्ता लोकगुरुणा तं प्रणम्य दिवौकसः।
न्यवर्तन्त गतोद्वेगा मेनिरे चासुरं हतम्॥ २९
नारदजी कहते हैं—सबके हृदयमें ज्ञानका संचार करनेवाले भगवान्ने जब देवताओंको यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आये। उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि हिरण्यकशिपु मर गया॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 826) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/4/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)