॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.5.39
नैर्ऋतास्ते समादिष्टा भर्त्रा वै शूलपाणयः।✎ 1101 1102
तिग्मदंष्ट्रकरालास्यास्ताम्रश्मश्रुशिरोरुहाः॥ ३९
nair:ṛtāste samādiṣṭā bhartrā vai śūlapāṇayaḥ|
tigmadaṃṣṭrakarālāsyāstāmraśmaśruśiroruhāḥ|| 39
अर्थ
जब हिरण्यकशिपुने दैत्योंको इस प्रकार आज्ञा दी, तब तीखी दाढ़, विकराल वदन, लाल-लाल दाढ़ी-मूँछ एवं केशोंवाले दैत्य हाथोंमें त्रिशूल ले-लेकर ‘मारो, काटो’—इस प्रकार बड़े जोरसे चिल्लाने लगे। प्रह्लाद चुपचाप बैठे हुए थे और दैत्य उनके सभी मर्मस्थानोंमें शूलसे घाव कर रहे थे॥ ३९-४०॥