श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.40

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नदन्तो भैरवान्‍नादांश्छिन्धि भिन्धीति वादिनः।

आसीनं चाहनन् शूलैः प्रह्रादं सर्वमर्मसु॥ ४०

nadanto bhairavānnādāṃśchindhi bhindhīti vādinaḥ|

āsīnaṃ cāhanan śūlaiḥ prahrādaṃ sarvamarmasu|| 40

अर्थ

जब हिरण्यकशिपुने दैत्योंको इस प्रकार आज्ञा दी, तब तीखी दाढ़, विकराल वदन, लाल-लाल दाढ़ी-मूँछ एवं केशोंवाले दैत्य हाथोंमें त्रिशूल ले-लेकर ‘मारो, काटो’—इस प्रकार बड़े जोरसे चिल्लाने लगे। प्रह्लाद चुपचाप बैठे हुए थे और दैत्य उनके सभी मर्मस्थानोंमें शूलसे घाव कर रहे थे॥ ३९-४०॥

यह अर्थ श्लोक 39–40 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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