॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.6.11
कथं प्रियाया अनुकम्पितायाः
सङ्गं रहस्यं रुचिरांश्च मन्त्रान्।
सुहृत्सु च स्नेहसितः शिशूनां
कलाक्षराणामनुरक्तचित्तः ॥ ११
kathaṃ priyāyā anukampitāyāḥ
saṅgaṃ rahasyaṃ rucirāṃśca mantrān|
suhṛtsu ca snehasitaḥ śiśūnāṃ
kalākṣarāṇāmanuraktacittaḥ || 11
अर्थ
जो अपनी प्रियतमा पत्नीके एकान्त सहवास, उसकी प्रेमभरी बातों और मीठी-मीठी सलाहपर अपनेको निछावर कर चुका है, भाई-बन्धु और मित्रोंके स्नेह-पाशमें बँध चुका है और नन्हें-नन्हें शिशुओंकी तोतली बोलीपर लुभा चुका है—भला, वह उन्हें कैसे छोड़ सकता है॥ ११॥