श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

कथं प्रियाया अनुकम्पितायाः

सङ्गं रहस्यं रुचिरांश्‍च मन्त्रान्।

सुहृत्सु च स्नेहसितः शिशूनां

कलाक्षराणामनुरक्तचित्तः ॥ ११

kathaṃ priyāyā anukampitāyāḥ

saṅgaṃ rahasyaṃ rucirāṃśca mantrān|

suhṛtsu ca snehasitaḥ śiśūnāṃ

kalākṣarāṇāmanuraktacittaḥ || 11

अर्थ

जो अपनी प्रियतमा पत्नीके एकान्त सहवास, उसकी प्रेमभरी बातों और मीठी-मीठी सलाहपर अपनेको निछावर कर चुका है, भाई-बन्धु और मित्रोंके स्नेह-पाशमें बँध चुका है और नन्हें-नन्हें शिशुओंकी तोतली बोलीपर लुभा चुका है—भला, वह उन्हें कैसे छोड़ सकता है॥ ११॥

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