॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.6.12
पुत्रान्स्मरंस्ता दुहितॄर्हृदय्या१
भ्रातॄन् स्वसॄर्वा पितरौ च दीनौ।
गृहान् मनोज्ञोरुपरिच्छदांश्च
वृत्तीश्च कुल्याः पशुभृत्यवर्गान्॥ १२✎ 1103
putrānsmaraṃstā duhitṝrhṛdayyā
bhrātṝn svasṝrvā pitarau ca dīnau|
gṛhān manojñoruparicchadāṃśca
vṛttīśca kulyāḥ paśubhṛtyavargān|| 12
अर्थ
जो अपनी ससुराल गयी हुई प्रिय पुत्रियों, पुत्रों, भाई-बहिनों और दीन अवस्थाको प्राप्त पिता-माता, बहुत-सी सुन्दर-सुन्दर बहुमूल्य सामग्रियोंसे सजे हुए घरों, कुलपरम्परागत जीविकाके साधनों तथा पशुओं और सेवकोंके निरन्तर स्मरणमें रम गया है, वह भला-उन्हें कैसे छोड़ सकता है॥ १२॥✎ 1988
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—दुहितॄश्च स्वसॄर्भ्रातॄन् कलत्रान् पित०।