॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.6.13
त्यजेत कोशस्कृदिवेहमानः
कर्माणि लोभादवितृप्तकामः।
औपस्थ्यजैह्व्यं बहु मन्यमानः ✎ 2022
कथं विरज्येत दुरन्तमोहः॥ १३
tyajeta kośaskṛdivehamānaḥ
karmāṇi lobhādavitṛptakāmaḥ|
aupasthyajaihvyaṃ bahu manyamānaḥ
kathaṃ virajyeta durantamohaḥ|| 13
अर्थ
जो जननेन्द्रिय और रसनेन्द्रियके सुखोंको ही सर्वस्व मान बैठा है, जिसकी भोगवासनाएँ कभी तृप्त नहीं होतीं, जो लोभवश कर्म-पर-कर्म करता हुआ रेशमके कीड़ेकी तरह अपनेको और भी कड़े बन्धनमें जकड़ता जा रहा है और जिसके मोहकी कोई सीमा नहीं है—वह उनसे किस प्रकार विरक्त हो सकता है और कैसे उनका त्याग कर सकता है॥ १३॥✎ 1988