श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.13

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

त्यजेत कोशस्कृदिवेहमानः

कर्माणि लोभादवितृप्तकामः।

औपस्थ्यजैह्व्यं बहु मन्यमानः ✎ 2022

कथं विरज्येत दुरन्तमोहः॥ १३

tyajeta kośaskṛdivehamānaḥ

karmāṇi lobhādavitṛptakāmaḥ|

aupasthyajaihvyaṃ bahu manyamānaḥ

kathaṃ virajyeta durantamohaḥ|| 13

अर्थ

जो जननेन्द्रिय और रसनेन्द्रियके सुखोंको ही सर्वस्व मान बैठा है, जिसकी भोगवासनाएँ कभी तृप्त नहीं होतीं, जो लोभवश कर्म-पर-कर्म करता हुआ रेशमके कीड़ेकी तरह अपनेको और भी कड़े बन्धनमें जकड़ता जा रहा है और जिसके मोहकी कोई सीमा नहीं है—वह उनसे किस प्रकार विरक्त हो सकता है और कैसे उनका त्याग कर सकता है॥ १३॥✎ 1988

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1988 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): गवाँ → गँवा
  • #2022 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): स्थ्यजैह्वॺं बहु → स्थ्यजैह्व्यं बहु

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