व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योऽविकल्पितः॥ २२
pratyagātmasvarūpeṇa dṛśyarūpeṇa ca svayam|
vyāpyavyāpakanirdeśyo hyanirdeśyo'vikalpitaḥ|| 22
अर्थ
वे ही अन्तर्यामी द्रष्टाके रूपमें हैं और वे ही दृश्य जगत्के रूपमें भी हैं। सर्वथा अनिर्वचनीय तथा विकल्परहित होनेपर भी द्रष्टा और दृश्य, व्याप्य और व्यापकके रूपमें उनका निर्वचन किया जाता है। वस्तुतः उनमें एक भी विकल्प नहीं है॥ २२॥
प्रत्यगात्मस्वरूपेण दृश्यरूपेण च स्वयम्।
व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योऽविकल्पितः॥ २२
वे ही अन्तर्यामी द्रष्टाके रूपमें हैं और वे ही दृश्य जगत्के रूपमें भी हैं। सर्वथा अनिर्वचनीय तथा विकल्परहित होनेपर भी द्रष्टा और दृश्य, व्याप्य और व्यापकके रूपमें उनका निर्वचन किया जाता है। वस्तुतः उनमें एक भी विकल्प नहीं है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.6.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 839) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/6/22/