श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.22

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

प्रत्यगात्मस्वरूपेण दृश्यरू४पेण च स्वयम्।

व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योऽविकल्पितः॥ २२

pratyagātmasvarūpeṇa dṛśyarūpeṇa ca svayam|

vyāpyavyāpakanirdeśyo hyanirdeśyo'vikalpitaḥ|| 22

अर्थ

वे ही अन्तर्यामी द्रष्टाके रूपमें हैं और वे ही दृश्य जगत‍्के रूपमें भी हैं। सर्वथा अनिर्वचनीय तथा विकल्परहित होनेपर भी द्रष्टा और दृश्य, व्याप्य और व्यापकके रूपमें उनका निर्वचन किया जाता है। वस्तुतः उनमें एक भी विकल्प नहीं है॥ २२॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—कालरूपेण।

    (मुद्रित पृष्ठ 839)

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