श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.10

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

जह्यासुरं भावमिमं त्वमात्मनः

समं मनो धत्स्व न सन्ति विद्विषः।

ऋतेऽजितादात्मन उत्पथस्थितात्

तद्धि ह्यनन्तस्य महत् समर्हणम्॥ १०

jahyāsuraṃ bhāvamimaṃ tvamātmanaḥ

samaṃ mano dhatsva na santi vidviṣaḥ|

ṛte'jitādātmana utpathasthitāt

taddhi hyanantasya mahat samarhaṇam|| 10

अर्थ

आप अपना यह आसुर भाव छोड़ दीजिये। अपने मनको सबके प्रति समान बनाइये। इस संसारमें अपने वशमें न रहनेवाले कुमार्गगामी मनके अतिरिक्त और कोई शत्रु नहीं है। मनमें सबके प्रति समताका भाव लाना ही भगवान्‌की सबसे बड़ी पूजा है॥ १०॥✎ 605 606

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #605 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #606 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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