श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.4

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

क्षिप्त्वा परुषया वाचा प्रह्रादमतदर्हणम्।

आहेक्षमाणः पापेन तिरश्चीनेन चक्षुषा॥ ४

kṣiptvā paruṣayā vācā prahrādamatadarhaṇam|

āhekṣamāṇaḥ pāpena tiraścīnena cakṣuṣā|| 4

अर्थ

मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले प्रह्लादजी बड़ी नम्रतासे हाथ जोड़कर चुपचाप हिरण्यकशिपुके सामने खड़े थे और तिरस्कारके सर्वथा अयोग्य थे। परन्तु हिरण्यकशिपु स्वभावसे ही क्रूर था। वह पैरकी चोट खाये हुए साँपकी तरह फुफकारने लगा। उसने उनकी ओर पापभरी टेढ़ी नजरसे देखा और कठोर वाणीसे डाँटते हुए कहा—॥ ४-५॥

यह अर्थ श्लोक 4–5 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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