॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.8.50
गन्धर्वा ऊचुः
वयं विभो ते नटनाट्यगायका
येनात्मसाद् वीर्यबलौजसा कृताः।
स एष१ नीतो भवता दशामिमां
किमुत्पथस्थः कुशलाय कल्पते॥ ५०
vayaṃ vibho te naṭanāṭyagāyakā
yenātmasād vīryabalaujasā kṛtāḥ|
sa eṣa nīto bhavatā daśāmimāṃ
kimutpathasthaḥ kuśalāya kalpate|| 50
अर्थ
गन्धर्वोंने कहा—प्रभो! हम आपके नाचनेवाले, अभिनय करनेवाले और संगीत सुनानेवाले सेवक हैं। इस दैत्यने अपने बल, वीर्य और पराक्रमसे हमें अपना गुलाम बना रखा था। उसे आपने इस दशाको पहुँचा दिया। सच है, कुमार्गसे चलनेवालेका भी क्या कभी कल्याण हो सकता है?॥ ५०॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—एव।