चारणोंने कहा—प्रभो! आपने सज्जनोंके हृदयको पीड़ा पहुँचानेवाले इस दुष्टको समाप्त कर दिया। इसलिये हम आपके उन चरणकमलोंकी शरणमें हैं, जिनके प्राप्त होते ही जन्म-मृत्युरूप संसारचक्रसे छुटकारा मिल जाता है॥ ५१॥
हरे तवाङ्घ्रिपङ्कजं भवापवर्गमाश्रिताः।
यदेष साधुहृच्छयस्त्वयासुरः समापितः॥ ५१
चारणोंने कहा—प्रभो! आपने सज्जनोंके हृदयको पीड़ा पहुँचानेवाले इस दुष्टको समाप्त कर दिया। इसलिये हम आपके उन चरणकमलोंकी शरणमें हैं, जिनके प्राप्त होते ही जन्म-मृत्युरूप संसारचक्रसे छुटकारा मिल जाता है॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.8.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 855) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/8/51/