श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.52

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यक्षा ऊचुः

वयमनुचरमुख्याः कर्मभिस्ते मनोज्ञै-

स्त२ इह दितिसुतेन प्रापिता वाहकत्वम्।

स तु जनपरितापं तत्कृतं जानता ते

नरहर उपनीतः पञ्चतां पञ्चविंश॥ ५२

vayamanucaramukhyāḥ karmabhiste manojñai-

sta iha ditisutena prāpitā vāhakatvam|

sa tu janaparitāpaṃ tatkṛtaṃ jānatā te

narahara upanītaḥ pañcatāṃ pañcaviṃśa|| 52

अर्थ

यक्षोंने कहा—भगवन्! अपने श्रेष्ठ कर्मोंके कारण हमलोग आपके सेवकोंमें प्रधान गिने जाते थे। परन्तु हिरण्यकशिपुने हमें अपनी पालकी ढोनेवाला कहार बना लिया। प्रकृतिके नियामक परमात्मा! इसके कारण होनेवाले अपने निजजनोंके कष्ट जानकर ही आपने इसे मार डाला है॥ ५२॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—रिह च दिति०।

    (मुद्रित पृष्ठ 855)

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