श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.26

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

क्‍वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन्

जातः सुरेतरकुले क्‍व तवानुकम्पा।

न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै रमाया

यन्मेऽर्पितः शिरसि पद्मकरः प्रसादः॥ २६

kvāhaṃ rajaḥprabhava īśa tamo'dhike'smin

jātaḥ suretarakule kva tavānukampā|

na brahmaṇo na tu bhavasya na vai ramāyā

yanme'rpitaḥ śirasi padmakaraḥ prasādaḥ|| 26

अर्थ

प्रभो! कहाँ तो इस तमोगुणी असुरवंशमें रजोगुणसे उत्पन्‍न हुआ मैं, और कहाँ आपकी अनन्त कृपा! धन्य है! आपने अपना परम प्रसादस्वरूप और सकलसन्तापहारी वह करकमल मेरे सिरपर रखा है, जिसे आपने ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मीजीके सिरपर भी कभी नहीं रखा॥ २६॥

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