श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.25

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

कुत्राशिषः श्रुतिसुखा मृगतृष्णिरूपाः

क्‍वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोहः१।

निर्विद्यते न तु जनो यदपीति विद्वान्

कामानलं मधुलवैः शमयन्दुरापैः॥ २५

kutrāśiṣaḥ śrutisukhā mṛgatṛṣṇirūpāḥ

kvedaṃ kalevaramaśeṣarujāṃ virohaḥ|

nirvidyate na tu jano yadapīti vidvān

kāmānalaṃ madhulavaiḥ śamayandurāpaiḥ|| 25

अर्थ

विषयभोगकी बातें सुननेमें ही अच्छी लगती हैं, वास्तवमें वे मृगतृष्णाके जलके समान नितान्त असत्य हैं और यह शरीर भी, जिससे वे भोग भोगे जाते हैं, अगणित रोगोंका उद्गमस्थान है। कहाँ वे मिथ्या विषयभोग और कहाँ यह रोगयुक्त शरीर! इन दोनोंकी क्षणभंगुरता और असारता जानकर भी मनुष्य इनसे विरक्त नहीं होता। वह कठिनाईसे प्राप्त होनेवाले भोगके नन्हें-नन्हें मधुविन्दुओंसे अपनी कामनाकी आग बुझानेकी चेष्टा करता है!॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—विमोहः।

    (मुद्रित पृष्ठ 861)

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