श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.32

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्ये

शेषेऽऽत्मना निजसुखानुभवो निरीहः।

योगेन मीलितदृगात्मनिपीतनिद्र-

स्तुर्ये स्थितो न तु तमो न गुणांश्‍च युङ्क्षे॥ ३२

nyasyedamātmani jagad vilayāmbumadhye

śeṣe''tmanā nijasukhānubhavo nirīhaḥ|

yogena mīlitadṛgātmanipītanidra-

sturye sthito na tu tamo na guṇāṃśca yuṅkṣe|| 32

अर्थ

भगवन्! आप इस सम्पूर्ण विश्‍वको स्वयं ही अपनेमें समेटकर आत्मसुखका अनुभव करते हुए निष्क्रिय होकर प्रलयकालीन जलमें शयन करते हैं। उस समय अपने स्वयंसिद्ध योगके द्वारा बाह्य दृष्टिको बंद कर आप अपने स्वरूपके प्रकाशमें निद्राको विलीन कर लेते हैं और तुरीय ब्रह्मपदमें स्थित रहते हैं। उस समय आप न तो तमोगुणसे ही युक्त होते और न तो विषयोंको ही स्वीकार करते हैं॥ ३२॥✎ 1917

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1917 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): स्वयं-सिद्ध → स्वयंसिद्ध

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