श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.34

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-

स्त्वां बीजमात्मनि ततं स्वबहिर्विचिन्त्य।

नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो

जातेऽङ्कुरे कथमु होपलभेत बीजम्॥ ३४

tatsambhavaḥ kavirato'nyadapaśyamāna-

stvāṃ bījamātmani tataṃ svabahirvicintya|

nāvindadabdaśatamapsu nimajjamāno

jāte'ṅkure kathamu hopalabheta bījam|| 34

अर्थ

उसपर सूक्ष्मदर्शी ब्रह्माजी प्रकट हुए। जब उन्हें कमलके सिवा और कुछ भी दिखायी न पड़ा, तब अपनेमें बीजरूपसे व्याप्त आपको वे न जान सके और आपको अपनेसे बाहर समझकर जलके भीतर घुसकर सौ वर्षतक ढूँढ़ते रहे। परन्तु वहाँ उन्हें कुछ नहीं मिला। यह ठीक ही है, क्योंकि अंकुर उग आनेपर उसमें व्याप्त बीजको कोई बाहर अलग कैसे देख सकता है॥ ३४॥✎ 1917

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1917 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): स्वयं-सिद्ध → स्वयंसिद्ध

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