॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.47
रूपे इमे सदसती तव वेदसृष्टे
बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य।
युक्ताः समक्षमुभयत्र विचिन्वते त्वां
योगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात्॥ ४७
rūpe ime sadasatī tava vedasṛṣṭe
bījāṅkurāviva na cānyadarūpakasya|
yuktāḥ samakṣamubhayatra vicinvate tvāṃ
yogena vahnimiva dāruṣu nānyataḥ syāt|| 47
अर्थ
वेदोंने बीज और अंकुरके समान आपके दो रूप बताये हैं—कार्य और कारण। वास्तवमें आप प्राकृत रूपसे रहित हैं। परन्तु इन कार्य और कारणरूपोंको छोड़कर आपके ज्ञानका कोई और साधन भी नहीं है। काष्ठ-मन्थनके द्वारा जिस प्रकार अग्नि प्रकट की जाती है, उसी प्रकार योगीजन भक्तियोगकी साधनासे आपको कार्य और कारण दोनोंमें ही ढूँढ़ निकालते हैं। क्योंकि वास्तवमें ये दोनों आपसे पृथक् नहीं हैं, आपके स्वरूप ही हैं॥ ४७॥