॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.48
त्वं वायुरग्निरवनिर्वियदम्बुमात्राः
प्राणेन्द्रियाणि हृदयं चिदनुग्रहश्च।
सर्वं त्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन्
नान्यत् त्वदस्त्यपि मनोवचसा निरुक्तम्॥ ४८
tvaṃ vāyuragniravanirviyadambumātrāḥ
prāṇendriyāṇi hṛdayaṃ cidanugrahaśca|
sarvaṃ tvameva saguṇo viguṇaśca bhūman
nānyat tvadastyapi manovacasā niruktam|| 48
अर्थ
अनन्त प्रभो! वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, पंचतन्मात्राएँ, प्राण, इन्द्रिय, मन, चित्त, अहंकार, सम्पूर्ण जगत् एवं सगुण और निर्गुण—सब कुछ केवल आप ही हैं। और तो क्या, मन और वाणीके द्वारा जो कुछ निरूपण किया गया है, वह सब आपसे पृथक् नहीं है॥ ४८॥