नारदजी कहते हैं—इस प्रकार भक्त प्रह्लादने बड़े प्रेमसे प्रकृति और प्राकृत गुणोंसे रहित भगवान्के स्वरूपभूत गुणोंका वर्णन किया। इसके बाद वे भगवान्के चरणोंमें सिर झुकाकर चुप हो गये। नृसिंहभगवान्का क्रोध शान्त हो गया और वे बड़े प्रेम तथा प्रसन्नतासे बोले॥ ५१॥
एतावद्वर्णितगुणो भक्त्या भक्तेन निर्गुणः।
प्रह्रादं प्रणतं प्रीतो यतमन्युरभाषत॥ ५१
नारदजी कहते हैं—इस प्रकार भक्त प्रह्लादने बड़े प्रेमसे प्रकृति और प्राकृत गुणोंसे रहित भगवान्के स्वरूपभूत गुणोंका वर्णन किया। इसके बाद वे भगवान्के चरणोंमें सिर झुकाकर चुप हो गये। नृसिंहभगवान्का क्रोध शान्त हो गया और वे बड़े प्रेम तथा प्रसन्नतासे बोले॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.9.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 866) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/9/51/