श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.51

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

नारद उवाच

एतावद्वर्णितगुणो भक्‍त्या भक्तेन निर्गुणः।

प्रह्रादं प्रणतं प्रीतो यतमन्युरभाषत॥ ५१

etāvadvarṇitaguṇo bhaktyā bhaktena nirguṇaḥ|

prahrādaṃ praṇataṃ prīto yatamanyurabhāṣata|| 51

अर्थ

नारदजी कहते हैं—इस प्रकार भक्त प्रह्लादने बड़े प्रेमसे प्रकृति और प्राकृत गुणोंसे रहित भगवान्‌के स्वरूपभूत गुणोंका वर्णन किया। इसके बाद वे भगवान्‌के चरणोंमें सिर झुकाकर चुप हो गये। नृसिंहभगवान्‌का क्रोध शान्त हो गया और वे बड़े प्रेम तथा प्रसन्‍नतासे बोले॥ ५१॥

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