श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.52

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

प्रह्राद भद्र भद्रं ते प्रीतोऽहं तेऽसुरोत्तम।

वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम्॥ ५२

prahrāda bhadra bhadraṃ te prīto'haṃ te'surottama|

varaṃ vṛṇīṣvābhimataṃ kāmapūro'smyahaṃ nṛṇām|| 52

अर्थ

श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहा—परम कल्याण-स्वरूप प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। दैत्यश्रेष्ठ! मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्‍न हूँ। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, मुझसे माँग लो। मैं जीवोंकी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ॥ ५२॥✎ 623

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #623 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्‌ने

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