dṛṣṭvā māṃ na punarjanturātmānaṃ taptumarhati|| 53
अर्थ
आयुष्मन्! जो मुझे प्रसन्न नहीं कर लेता, उसे मेरा दर्शन मिलना बहुत ही कठिन है। परन्तु जब मेरे दर्शन हो जाते हैं, तब फिर प्राणीके हृदयमें किसी प्रकारकी जलन नहीं रह जाती॥ ५३॥
मामप्रीणत आयुष्मन्दर्शनं दुर्लभं हि मे।
दृष्ट्वा मां न पुनर्जन्तुरात्मानं तप्तुमर्हति॥ ५३
आयुष्मन्! जो मुझे प्रसन्न नहीं कर लेता, उसे मेरा दर्शन मिलना बहुत ही कठिन है। परन्तु जब मेरे दर्शन हो जाते हैं, तब फिर प्राणीके हृदयमें किसी प्रकारकी जलन नहीं रह जाती॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.9.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 866) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/9/53/