॥ श्रीहरिः ॥
कबन्धास्तत्र चोत्पेतुः पतितस्वशिरोऽक्षिभिः।
उद्यतायुधदोर्दण्डैराधावन्तो भटान् मृधे॥ ४०
kabandhāstatra cotpetuḥ patitasvaśiro'kṣibhiḥ|
udyatāyudhadordaṇḍairādhāvanto bhaṭān mṛdhe|| 40
अर्थ
तब वहाँ बहुत-से धड़ अपने कटकर गिरे हुए सिरोंके नेत्रोंसे देखकर हाथोंमें हथियार उठा वीरोंकी ओर दौड़ने और उछलने लगे॥ ४०॥
कबन्धास्तत्र चोत्पेतुः पतितस्वशिरोऽक्षिभिः।
उद्यतायुधदोर्दण्डैराधावन्तो भटान् मृधे॥ ४०
तब वहाँ बहुत-से धड़ अपने कटकर गिरे हुए सिरोंके नेत्रोंसे देखकर हाथोंमें हथियार उठा वीरोंकी ओर दौड़ने और उछलने लगे॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 955) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/40/