॥ श्रीहरिः ॥
सृष्टो दैत्येन सुमहान्वह्निः श्वसनसारथिः।
सांवर्तक इवात्युग्रो विबुधध्वजिनीमधाक्॥ ५०
sṛṣṭo daityena sumahānvahniḥ śvasanasārathiḥ|
sāṃvartaka ivātyugro vibudhadhvajinīmadhāk|| 50
अर्थ
दैत्यराज बलिने प्रलयकी अग्निके समान बड़ी भयानक आगकी सृष्टि की। वह बात-की-बातमें वायुकी सहायतासे देवसेनाको जलाने लगी॥ ५०॥
सृष्टो दैत्येन सुमहान्वह्निः श्वसनसारथिः।
सांवर्तक इवात्युग्रो विबुधध्वजिनीमधाक्॥ ५०
दैत्यराज बलिने प्रलयकी अग्निके समान बड़ी भयानक आगकी सृष्टि की। वह बात-की-बातमें वायुकी सहायतासे देवसेनाको जलाने लगी॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 956) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/50/