श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.53

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

न१ तत्प्रतिविधिं यत्र विदुरिन्द्रादयो नृप।✎ 2224

ध्यातः प्रादुरभूत् तत्र२ भगवान्विश्‍वभावनः॥ ५३✎ 2225

na tatpratividhiṃ yatra vidurindrādayo nṛpa|

dhyātaḥ prādurabhūt tatra bhagavānviśvabhāvanaḥ|| 53

अर्थ

परीक्षित्! इन्द्र आदि देवताओंने उनकी मायाका प्रतीकार करनेके लिये बहुत कुछ सोचा-विचारा, परन्तु उन्हें कुछ न सूझा। तब उन्होंने विश्‍वके जीवनदाता भगवान्‌का ध्यान किया और ध्यान करते ही वे वहीं प्रकट हो गये॥ ५३॥✎ 725

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—नैतत्।

    (मुद्रित पृष्ठ 956)
  2. २

    प्रा० पा०—तस्मिन्।

    (मुद्रित पृष्ठ 956)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #725 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #2224 टिप्पणी: → प्रा० पा०—नैतत्।
  • #2225 टिप्पणी: → प्रा० पा०—तस्मिन्।

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