श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.55

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तस्मिन्प्रविष्टेऽसुरकूटकर्मजा

माया विनेशुर्महिना महीयसः।

स्वप्नो यथा हि प्रतिबोध आगते

हरिस्मृतिः सर्वविपद्विमोक्षणम्॥ ५५

tasminpraviṣṭe'surakūṭakarmajā

māyā vineśurmahinā mahīyasaḥ|

svapno yathā hi pratibodha āgate

harismṛtiḥ sarvavipadvimokṣaṇam|| 55

अर्थ

परम पुरुष परमात्माके प्रकट होते ही उनके प्रभावसे असुरोंकी वह कपटभरी माया विलीन हो गयी—ठीक वैसे ही जैसे जग जानेपर स्वप्नकी वस्तुओंका पता नहीं चलता। ठीक ही है, भगवान्‌की स्मृति समस्त विपत्तियोंसे मुक्त कर देती है॥ ५५॥✎ 726 727 728 729

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #726 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #727 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #728 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #729 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें