श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.32

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

न तस्य हि त्वचमपि वज्र ऊर्जितो

बिभेद यः सुरपतिनौजसेरितः।

तदद्भुतं परमतिवीर्यवृत्रभित्

तिरस्कृतो नमुचिशिरोधरत्वचा॥ ३२

na tasya hi tvacamapi vajra ūrjito

bibheda yaḥ surapatinaujaseritaḥ|

tadadbhutaṃ paramativīryavṛtrabhit

tiraskṛto namuciśirodharatvacā|| 32

अर्थ

यद्यपि इन्द्रने बड़े वेगसे वह वज्र चलाया था, परन्तु उस यशस्वी वज्रसे उसके चमड़ेपर खरोंचतक नहीं आयी। यह बड़ी आश्‍चर्यजनक घटना हुई कि जिस वज्रने महाबली वृत्रासुरका शरीर टुकड़े-टुकड़े कर डाला था, नमुचिके गलेकी त्वचाने उसका तिरस्कार कर दिया॥ ३२॥

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