उस आकाशवाणीको सुनकर देवराज इन्द्र बड़ी एकाग्रतासे विचार करने लगे। सोचते-सोचते उन्हें सूझ गया कि समुद्रका फेन तो सूखा भी है, गीला भी;॥ ३९॥
तां दैवीं गिरमाकर्ण्य मघवान्सुसमाहितः।
ध्यायन् फेनमथापश्यदुपायमुभयात्मकम्॥ ३९
उस आकाशवाणीको सुनकर देवराज इन्द्र बड़ी एकाग्रतासे विचार करने लगे। सोचते-सोचते उन्हें सूझ गया कि समुद्रका फेन तो सूखा भी है, गीला भी;॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.11.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 961) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/11/39/