श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.20

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

दिक्षु भ्रमत्कन्दुकचापलैर्भृशं

प्रोद्विग्नतारायतलोललोचनाम् ।

स्वकर्णविभ्राजितकुण्डलोल्लसत्-

कपोलनीलालकमण्डिताननाम्॥ २०

dikṣu bhramatkandukacāpalairbhṛśaṃ

prodvignatārāyatalolalocanām |

svakarṇavibhrājitakuṇḍalollasat-

kapolanīlālakamaṇḍitānanām|| 20

अर्थ

उछलता हुआ गेंद जब इधर-उधर छलक जाता था, तब वह लपककर उसे रोक लेती थी। इससे उसकी बड़ी-बड़ी चंचल आँखें कुछ उद्विग्न-सी हो रही थीं। उसके कपोलोंपर कानोंके कुण्डलोंकी आभा जगमगा रही थी और घुँघराली काली-काली अलकें उनपर लटक आती थीं, जिससे मुख और भी उल्लसित हो उठता था॥ २०॥✎ 2034

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2034 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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