श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.24

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

एवं तां रुचिरापाङ्गीं दर्शनीयां मनोरमाम्।

दृष्ट्वा तस्यां मनश्‍चक्रे विषज्जन्त्यां भवः किल॥ २४

evaṃ tāṃ rucirāpāṅgīṃ darśanīyāṃ manoramām|

dṛṣṭvā tasyāṃ manaścakre viṣajjantyāṃ bhavaḥ kila|| 24

अर्थ

मोहिनीका एक-एक अंग बड़ा ही रुचिकर और मनोरम था। जहाँ आँखें लग जातीं, लगी ही रहतीं। यही नहीं, मन भी वहीं रमण करने लगता। उसको इस दशामें देखकर भगवान् शंकर उसकी ओर अत्यन्त आकृष्ट हो गये। उन्हें मोहिनी भी अपने प्रति आसक्त जान पड़ती थी॥ २४॥

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