मोहिनी वस्त्रहीन तो पहले ही हो चुकी थी, शंकरजीको अपनी ओर आते देख बहुत लज्जित हो गयी। वह एक वृक्षसे दूसरे वृक्षकी आड़में जाकर छिप जाती और हँसने लगती। परन्तु कहीं ठहरती न थी॥ २६॥
सा तमायान्तमालोक्य विवस्त्रा व्रीडिता भृशम्।
निलीयमाना वृक्षेषु हसन्ती नान्वतिष्ठत॥ २६
मोहिनी वस्त्रहीन तो पहले ही हो चुकी थी, शंकरजीको अपनी ओर आते देख बहुत लज्जित हो गयी। वह एक वृक्षसे दूसरे वृक्षकी आड़में जाकर छिप जाती और हँसने लगती। परन्तु कहीं ठहरती न थी॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.12.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 966) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/12/26/