श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.39

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

को नु मेऽतितरेन्मायां विषक्तस्त्वदृते पुमान्।

तांस्तान्विसृजतीं भावान्दुस्तरामकृतात्मभिः॥ ३९

ko nu me'titarenmāyāṃ viṣaktastvadṛte pumān|

tāṃstānvisṛjatīṃ bhāvāndustarāmakṛtātmabhiḥ|| 39

अर्थ

मेरी माया अपार है। वह ऐसे-ऐसे हाव-भाव रचती है कि अजितेन्द्रिय पुरुष तो किसी प्रकार उससे छुटकारा पा ही नहीं सकते। भला, आपके अतिरिक्त ऐसा कौन पुरुष है, जो एक बार मेरी मायाके फंदेमें फँसकर फिर स्वयं ही उससे निकल सके॥ ३९॥

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