श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.14

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

आकाशगङ्गया देव्या वृतां परिखभूतया।

प्राकारेणाग्‍निवर्णेन साट्टालेनोन्‍नतेन च॥ १४

ākāśagaṅgayā devyā vṛtāṃ parikhabhūtayā|

prākāreṇāgnivarṇena sāṭṭālenonnatena ca|| 14

अर्थ

ज्योतिर्मय आकाशगंगाने खाईकी भाँति अमरावतीको चारों ओरसे घेर रखा है। उसके चारों ओर बहुत ऊँचा सोनेका परकोटा बना हुआ है, जिसमें स्थान-स्थानपर बड़ी-बड़ी अटारियाँ बनी हुई हैं॥ १४॥

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