श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ततो रथः काञ्चनपट्टनद्धो

हयाश्‍च हर्यश्‍वतुरङ्गवर्णाः।

ध्वजश्‍च सिंहेन विराजमानो

हुताशनादास हविर्भिरिष्टात्॥ ५

tato rathaḥ kāñcanapaṭṭanaddho

hayāśca haryaśvaturaṅgavarṇāḥ|

dhvajaśca siṃhena virājamāno

hutāśanādāsa havirbhiriṣṭāt|| 5

अर्थ

यज्ञकी विधिसे हविष्योंके द्वारा जब अग्‍निदेवताकी पूजा की गयी, तब यज्ञकुण्डमेंसे सोनेकी चद्दरसे मढ़ा हुआ एक बड़ा सुन्दर रथ निकला। फिर इन्द्रके घोड़ों-जैसे हरे रंगके घोड़े और सिंहके चिह्नसे युक्त रथपर लगानेकी ध्वजा निकली॥ ५॥

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