श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

निर्वर्तितात्मनियमो देवमर्चेत् समाहितः।

अर्चायां स्थण्डिले सूर्ये जले वह्नौ गुरावपि॥ २८

nirvartitātmaniyamo devamarcet samāhitaḥ|

arcāyāṃ sthaṇḍile sūrye jale vahnau gurāvapi|| 28

अर्थ

इसके बाद अपने नित्य और नैमित्तिक नियमोंको पूरा करके एकाग्रचित्तसे मूर्ति, वेदी, सूर्य, जल, अग्‍नि और गुरुदेवके रूपमें भगवान्‌की पूजा करे॥ २८॥✎ 752 753

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #752 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #753 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् ने → वराहभगवान्‌ने

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