श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.31

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

नमो द्विशीर्ष्णे त्रिपदे चतुःशृङ्गाय तन्तवे।

सप्तहस्ताय यज्ञाय त्रयीविद्यात्मने नमः॥ ३१

namo dviśīrṣṇe tripade catuḥśṛṅgāya tantave|

saptahastāya yajñāya trayīvidyātmane namaḥ|| 31

अर्थ

आप वह यज्ञ हैं, जिसके प्रायणीय और उदयनीय—ये दो कर्म सिर हैं। प्रातः, मध्याह्न और सायं—ये तीन सवन ही तीन पाद हैं। चारों वेद चार सींग हैं। गायत्री आदि सात छन्द ही सात हाथ हैं। यह धर्ममय वृषभरूप यज्ञ वेदोंके द्वारा प्रतिपादित है और इसकी आत्मा हैं स्वयं आप! आपको मेरा नमस्कार है॥ ३१॥✎ 752 753

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #752 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #753 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् ने → वराहभगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें