एक सौ आठ बार द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करे और स्तुतियोंके द्वारा भगवान्का स्तवन करे। प्रदक्षिणा करके बड़े प्रेम और आनन्दसे भूमिपर लोटकर दण्डवत्-प्रणाम करे॥ ४२॥✎ 754755
जपेदष्टोत्तरशतं स्तुवीत स्तुतिभिः प्रभुम्।
कृत्वा प्रदक्षिणं भूमौ प्रणमेद् दण्डवन्मुदा॥ ४२
एक सौ आठ बार द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करे और स्तुतियोंके द्वारा भगवान्का स्तवन करे। प्रदक्षिणा करके बड़े प्रेम और आनन्दसे भूमिपर लोटकर दण्डवत्-प्रणाम करे॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 982) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)