श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.45

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

स्नातः शुचिर्यथोक्तेन विधिना सुसमाहितः।

पयसा स्नापयित्वार्चेद् यावद्व्रतसमापनम्॥ ४५

snātaḥ śuciryathoktena vidhinā susamāhitaḥ|

payasā snāpayitvārced yāvadvratasamāpanam|| 45

अर्थ

दक्षिणा आदिसे उनका सत्कार करे। इसके बाद उनसे आज्ञा लेकर अपने इष्ट-मित्रोंके साथ बचे हुए अन्‍नको स्वयं ग्रहण करे। उस दिन ब्रह्मचर्यसे रहे और दूसरे दिन प्रातःकाल ही स्नान आदि करके पवित्रतापूर्वक पूर्वोक्त विधिसे एकाग्र होकर भगवान्‌की पूजा करे। इस प्रकार जबतक व्रत समाप्त न हो, तबतक दूधसे स्नान कराकर प्रतिदिन भगवान्‌की पूजा करे॥ ४४-४५॥✎ 756 757

यह अर्थ श्लोक 44–45 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #756 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #757 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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